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    श्रावण का सोमवार

    पवित्र श्रावण मास के पहले सोमवार कि आप सभी समाज बंधुओं को CAPS ग्रुप कि और से हार्दिक शुभकामनाएं 

    बड़े ही फलदायक हैं श्रावण सोमवार व्रत  

    श्रावण मास में भगवान त्रिलोकीनाथ, डमरुधर भगवान शिवशंकर की पूजा अर्चना का बहुत अधिक महत्व है। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए श्रावण मास में भक्त लोग उनका अनेकों प्रकार से पूजन अभिषेक करते हैं। भगवान भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं। वह प्रसन्न होकर भक्तों की इच्छा पूर्ण करते हैं।
    इस बार श्रावण मास में 9, 16, 23 और 30 जुलाई को सोमवार व्रत हैं। श्रावण मास के इन समस्त सोमवारों के दिन व्रत लेने से पूरे साल भर के सोमवार व्रत का पुण्य मिलता है। सोमवार के व्रत के दिन प्रातः काल ही स्नान ध्यान के उपरांत मंदिर देवालय या घर पर श्री गणेश जी की पूजा के साथ शिव पार्वती और नंदी बैल की पूजा की जाती है। इस दिन प्रसाद के रूप में जल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी, जनेऊ, चंदन, रोली, बेल पत्र, भांग, धतूरा, धूप, दीप और दक्षिणा के साथ ही नंदी बैल के लिए चारा या आटे की पिन्नी बनाकर भगवान पशुपतिनाथ का पूजन किया जाता है।
    रात्रिकाल में घी और कपूर सहित धूप की आरती करके शिव महिमा का गुणगान किया जाता है। लगभग श्रावण मास के सभी सोमवारों को यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। सुहागन स्त्रियों को इस दिन व्रत रखने से अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है। विद्यार्थियों को सोमवार का व्रत रखने से और शिव मंदिर में जलाभिषेक करने से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है। बेरोजगार और अकर्मण्य जातकों को रोजगार और काम मिलने से मान प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।
    सदगृहस्थ नौकरी पेशा या व्यापारी को श्रावण के सोमवार व्रत करने से धन धान्य और लक्ष्मी की वृद्धि होती है। प्रौढ़ तथा वृद्ध जातक अगर सोमवार का व्रत रख सकते हैं तो उन्हें इस लोक और परलोक में सुख सुविधा और आराम मिलता है। सोमवार के व्रत के दिन गंगाजल से स्नान करना और देवालय तथा शिव मंदिर में जल चढ़ाना आज भी उत्तर भारत में कांवड़ परंपरा का सूत्रपात करती हैं।
    अविवाहित महिलाएं अनुकूल वर के लिए श्रावण के सोमवार का व्रत धारण कर सकती हैं। सुहागन महिला अपने पति एवं पुत्र की रक्षा के लिए, कुंवारी कन्या इच्छित वर प्राप्ति के लिए एवं अपने भाई, पिता की उन्नति के लिए पूरी श्रद्धा के साथ व्रत धारण करती हैं। श्रावण व्रत कुल वृद्धि के लिए, लक्ष्मी प्राप्ति के लिए, सम्मान के लिए भी किया जाता है।
    इस व्रत में माता पार्वती और शिवजी का पूजन किया जाता है। शिवजी की पूजा-अराधना में गंगाजल से स्नान और भस्म अर्पण का विशेष महत्त्व है। पूजा में धतूरे के फूलों, बेलपत्र, धतूरे के फल, सफेद चन्दन, भस्म आदि का प्रयोग अनिवार्य है।
    सुबह स्नान करके, सफेद वस्त्र धारण कर काम क्रोध आदि का त्याग करें। सुगंधित श्वेत पुष्प लाकर भगवान का पूजन करें। नैवेद्य में अभिष्ट अन्न के बने हुए पदार्थ अर्पण करें। फिर… ओम नमो दशभुजाय त्रिनेत्राय पन्चवदनाय शूलिने। श्वेतवृषभारुढ़ाय सर्वाभरणभूषिताय। उमादेहार्धस्थाय नमस्ते सर्वमूर्तयेनमः… इन मंत्रो से पूजा व हवन करें। ऐसा करने से सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं। 

    निर्जला एकादशी: 24 एकादशियों का फल एक साथ

    साल की सभी 24 एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है। उपवास के कठोर नियमों के कारण ही सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है। इसे पाण्डव एकादशी और भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    मान्यता:
    ऐसी मान्यता है कि जो श्रद्धालु साल की सभी 24 एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं हैं उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता है। यहां तक की अन्य एकादशियों के व्रत भंग होने के दोष भी निर्जला एकादशी के व्रत से दूर हो जाते हैं।

    समय:

    निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के दौरान किया जाता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मई या जून के महीने में होता है। साधारणतः निर्जला एकादशी का व्रत गंगा दशहरा के अगले दिन पड़ता है। इस साल 2015 में निर्जला एकादशी का व्रत आज शुक्रवार 29 मई को है।

    महत्व:
    निर्जला एकादशी का व्रत करना सभी तीर्थों में स्नान करने के समान है। इस व्रत को करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति पाता है। जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करता है उनको मृत्यु के समय मानसिक और शारीरिक कष्ट नहीं होता है। इस व्रत को करने के बाद जो व्यक्ति स्नान, तप और दान करता है, उसे करोड़ों गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है।

    पूजन विधि:
    निर्जला एकादशी का व्रत करने के लिये दशमी तिथि से ही व्रत के नियमों का पालन आरंभ हो जाता है। इस दिन ब्रह्म वेला में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर श्वेत वस्त्र धारण करके भगवान् विष्णु का पूजन, अर्चन और स्तवन करना चाहिए। व्रती को अगले दिन सूर्योदय होने तक अन्न और जल का त्याग करते हुए नारायण का ध्यान करना चाहिये और दिन में विष्णु सहस्रनाम का 11 बार पाठ करना चाहिए। द्वादशी वाले दिन फिर से नारायण का पूजन और अर्चन करके पीपल के वृक्ष के नीचे जाकर धूप आदि से पूजन करें और 11 बार परिक्रमा करें। इस दिन व्रत करने के अतिरिक्त जप, तप और गंगा स्नान करना भी शुभ रहता है।

    व्रत कथा:
    पाण्डवों में दूसरा भाई भीमसेन, खाने-पीने का अत्यधिक शौक़ीन था और अपनी भूख को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं था। इसी कारण वह एकादशी व्रत को नहीं कर पाता था। भीम के अलावा बाकी चारों पाण्डव भाई, माता कुंती और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। भीम अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान था। उसे लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहा है। इस दुविधा से उबरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गया तब महर्षि व्यास ने उसे साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत करने की सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की 24 एकादशियों के तुल्य है। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।