गुरुदेव की नवमी पुण्यतिथि पर सादर शत् शत् वंदन


पूज्यनीय ब्रह्मलीन संत श्री 1008 श्री किशनाराम जी महाराज का ननिहाल रोहिचा (कल्ला) में भाखररामजी कुरड के यहां माता श्रीमती चुन्नीबाई की कोख से दिनांक 20 अक्टूबर, 1930 को जन्म हुआ किशनारामजी के पिताजी का नाम वजारामजी ओड सुपुत्र श्री विरमारामजी हैं जो (लूनी) के रहने वाले हैं। सात वर्ष की अवस्था में किशनारामजी के स्वास्थ्य में दिनोंदिन गिरावट आती गयी, इस कारण वजारामजी किशनारामजी को शिकारपुरा आश्रम लेकर जाते और समाधी की परिक्रमा देकर वापस घर लौट आते, इसी बीच वजारामजी की भेंट मंहत श्री देवारामजी महाराज के साथ हुई जिन्होंने किशनारामजी को अपने सानिध्य में रखने की इच्छा जाहिर की, तब वजारामजी ने अपने परिवार वालों से सलाह-मशविरा करके देवारामजी महाराज के सानिध्य में शिकारपुरा आश्रम को सुपुर्द कर दिया। फिर देवारामजी महाराज के सानिध्य में किशनारामजी की प्राथमिक शिक्षा आरम्भ हुई तथा साथ ही धर्म और समाज संबंधी जानकारियां भी देते रहें। प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद जोधपुर से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की तथा साथ ही आयुर्वेद शिक्षा (रजि. संख्या 6464 ए) का भी ज्ञान प्राप्त किया। शिक्षा ग्रहण करने के बाद महंत श्री देवारामजी ने शिकारपुरा आश्रम की जिम्मेदारी श्री किशनारामजी को सौंप दी। तत्पश्चात अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए महंत श्री देवारामजी के देवलोक गमन के बाद आषाढ़ वद 4 बुधवार विक्रम संवत 2053 को शिकारपुरा आश्रम के गादीपति बने। पीठाधीश बनने के बाद महंत श्री किसनारामजी महाराज ने अपने गुरू के बतलाये हुए रास्ते पर चलते हुए समाज के चहुंमुखी विकास के लिए दिन-रात एक कर दिया। किशनारामजी हँसमुख एवं मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। वे गरीब जनता की नि:शुल्क तथा सेवाभाव से उपचार करते थे। किशनारामजी ने अपना पूरा जीवन जनसेवा और गौसेवा में समर्पित कर दिया।
आश्रम में आनेवाले दर्शनार्थियों में छोटे से बड़े तक के लिए भोजन की नि:शुल्क व्यवस्था वर्षों से चल रही है, महंत श्री का कहना था कि मंदिर में बनाने वाली प्रसाद आने वाले हर श्रद्धालुओं को मिलनी चाहिए। इसलिए आश्रम का भोजनालय 24 घंटे खुला रहता है। यह व्यवस्था बिना किसी भेदभाव अनवरत चल रही है, इसलिए हर जाति धर्म के हजारों भक्त आपके अनुयायी हैं।
किशनारामजी महाराज ने समाज के चहुंमुखी विकास के लिए सर्वप्रथम बालिका शिक्षा एवं मृत्युभोज पर ज्यादा जोर दिया शिक्षण संस्थानों एवं छात्रावासों का निर्माण करवाया। किशनारामजी के प्रयास से राजारामजी आश्रम, शिकारपुरा में श्री राधेकृष्ण् मंदिर का निर्माण, जोधपुर के पाल रोड में संतश्री देवारामजी छात्रावास एवं कालेज का निर्माण, आहोर में श्री राजारामजी आंजना पटेल छात्रावास का निर्माण, जालोर में श्री राजारामजी आंजना पटेल छात्रावास का निर्माण, दिल्ली में शिक्षण संस्थान के लिए भूमि की खरीद, हरिद्वार एवं रामदेवरा में धर्मशाला का निर्माण, माउंट आबू में श्री राजारामजी छात्रावास एवं शिक्षण संस्थान का निर्माण इत्यादि अनेक कार्य सम्पन्न किये तथा कल्याणपुर मे श्री राजारामजी चिकित्सालय का शिलान्यास भी किशनारामजी के करकमलों द्वारा हुआ । वर्तमान में राजस्थान में 60, गुजरात में 48, मध्यप्रदेश में 35, कर्नाटक में 10, महाराष्ट्र में 6, तमिलनाडु में 4 छात्रावास का निर्माण हुआ।
इसी दरमियान किशनारामजी ने कलबी आंजना समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए अखिल भारतीय आंजना (पटेल) समाज महासभा का गठन किया, जिसके जरिये महंत जी ने समूचे भारत में फैले हुए आंजना समाज को एक नई दिशा प्रदान की, जिसके फलस्वरूप आज समाज की छबि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। महंत श्री किशनारामजी ने हमेशा समाज के लोंगों को सावित्व एवं संस्कारपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा दी तथा बाल-विवाह पर रोक एवं बालिका शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया। किशनारामजी समाज में समाज सुधारक के नाम से भी जाने जाते हैं।
आंजना समाज के लिए किशनारामजी ने तन-मन-धन से प्रयास करके समाज को एक उन्नतिशील समाज की दौड़ में शामिल करके 77 वर्ष की अवस्था में दिनांक 06-01-2007 को परमात्मा में लीन हो गये।

1 comment:

  1. गंगा समान निर्मल, धर्म प्रचारक, कृष्ण
    स्वरूप अवतारी, भक्तो के कल्याणकारी,
    सुखकारी,ह्रदय विभोर ओजस्वी संत
    पूज्यनीय ब्रह्मलीन संत श्री 1008 श्री
    किशनाराम जी महाराज की नवमी
    पुण्यतिथी पर शत् शत् नमन ।

    ReplyDelete

आपके अतुल्य कमेंट के लिये कैप्स परिवार आपका आभारी है, हमें बेहतर सेवा देना का अवसर प्रदान करे।