नेहड़ बेल्ट में किसान अपना रहे जैविक खेती

- जैविक खेती को लेकर सरकार की ओर से किसानों को अनुदान भी दिया जाता है
-जैविक खेती से जहां पर्यावरण शुद्धि होती है

खेती किसानी में फर्टिलाइजर का लगातार उपयोग करने से खेतों में मिट्टी की उर्वरता घटने के साथ इसका असर फसल की उत्पादकता पर पड़ने लगा है। एक ओर जहां भरपूर मेहनत के बाद भी किसानों को फसल की पूरी उपज नहीं मिलती, वहीं दूसरी ओर बाजार में जैविक उत्पाद के मुकाबले फसल की आधी कीमत भी नहीं मिल पाती। ऐसे में क्षेत्र के किसानों का पारंपरिक देसी तरीकों से की जाने वाली जैविक खेती की तरफ फिर से रुझान बढ़ने लगा है। सांचौर बेल्ट में नर्मदा के पानी से खेती करने वाले किसानों ने पहल करते हुए कई गांवों में जैविक खेती शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार जिले के ग्रामीण अंचलों में ही नहीं, बल्कि राज्य के कई इलाकों में 80 के दशक तक जैविक यौगिक खेती किसानों की उपज का मुख्य आधार था। मानसून आने से पहले ही किसान अपने स्तर पर प्राकृतिक खाद को तैयार कर खेतों में बैलों के साथ जुताई करना शुरू कर देते थे। मगर बुवाई की नई तकनीक और फसल की ज्यादा उपज लेने के चक्कर में किसान जैविक खेती छोड़ यूरिया और रासायनिक खाद का उपयोग करने लगे। खेतों में इसके लगातार उपयोग से कुछ सालों तक तो किसानों को अच्छी उपज मिलती रही। मगर उर्वरक पेस्टी साइट के लगातार उपयोग से एक निश्चित समयावधि के बाद जमीन की उर्वरक क्षमता कमजोर होने लगी। जिससे उपज कम होने के साथ साथ अनाज की शुद्धता पोषक तत्वों में भी गिरावट आने लगी है।

विभागको बताने होंगे जैविक खेती के फायदे
किसानों को जैविक पद्धति से खेती के फायदे बताने के लिए खुद कृषि विभाग को भी पहल करनी होगी।विभाग की ओर से गांवों में कार्यशालाएं आयोजित करने के साथ भ्रमण कार्यक्रम के साथ जैविक खेती के बारे में प्रचार प्रसार करना होगा। जिससे किसानों को इसके फायदे तथा सरकार की ओर से मिलने वाले अनुदान सहित विभिन्न योजनाओं की जानकारी मिल सके। मौजूदा समय में क्षेत्र के कई किसानों को सरकारी योजनाओं और जैविक पद्धति पर आधारित खेती की पूर्णतया जानकारी तक नहीं हैं।

जैविक खेती में फसल से ही मिल सकते हैं बीज
किसानोंको हर बार खेतों में बुवाई के लिए विभिन्न कंपनियों के ब्रांडेड हाईब्रिड बीज खरीदने पड़ते हैं। मगर जैविक खेती अपनाने पर बीज अलग से नहीं खरीदने होंगे। जैविक खेती में फसल से ही अच्छे बीज अलग कर दोबारा बुवाई के लिए बीजों का भंडारण किया जा सकता है।
अनुदानको लेकर गाइडलाइन की तैयारी
कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की ओर से उन्हें अनुदान के रुप में प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है। पुरानी गाइडलाइन के अनुसार किसानों को तीन साल में दस हजार रुपए की राशि जैविक खेती करने पर अनुदान के तौर पर दी जाती थी। जिसमें पहले साल छह हजार दूसरे तथा तीसरे साल में दो-दो हजार रुपए दिए जाते थे। इस बार भी राज्य सरकार किसानों को मिलने वाले अनुदान को लेकर गाइडलाइन जारी करने की तैयारी में हैं।

विभागकी ओर से गांवों में कार्यशालाएं आयोजित करने के साथ भ्रमण कार्यक्रम के साथ जैविक खेती के बारे में प्रचार प्रसार करना होगा। जिससे किसानों को इसके फायदे तथा सरकार की ओर से मिलने वाले अनुदान सहित विभिन्न योजनाओं की जानकारी मिल सके। मौजूदा समय में क्षेत्र के कई किसानों को सरकारी योजनाओं और जैविक पद्धति पर आधारित खेती की पूर्णतया जानकारी तक नहीं हैं।
जैविकखेती में फसल से ही मिल सकते हैं बीज : किसानोंको हर बार खेतों में बुवाई के लिए विभिन्न कंपनियों के ब्रांडेड हाईब्रिड बीज खरीदने पड़ते हैं। मगर जैविक खेती अपनाने पर बीज अलग से नहीं खरीदने होंगे। जैविक खेती में फसल से ही अच्छे बीज अलग कर दोबारा बुवाई के लिए बीजों का भंडारण किया जा सकता है।

अनुदानको लेकर गाइडलाइन की तैयारी
कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की ओर से उन्हें अनुदान के रुप में प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है। पुरानी गाइडलाइन के अनुसार किसानों को तीन साल में दस हजार रुपए की राशि जैविक खेती करने पर अनुदान के तौर पर दी जाती थी। जिसमें पहले साल छह हजार दूसरे तथा तीसरे साल में दो-दो हजार रुपए दिए जाते थे। इस बार भी राज्य सरकार किसानों को मिलने वाले अनुदान को लेकर गाइडलाइन जारी करने की तैयारी में हैं।

बढ़ेगा गोपालन
अस्सी के दशक इससे पहले खेती के साथ किसान गाय बैल भी पालते थे। बैलों को हल में जोत जुताई की जाती थी। वहीं बैलगाड़ी से माल ढोने का रोजगार भी गांव में उपलब्ध हो जाता था। वहीं किसानों को जुताई माल वहन के लिए अलग से खर्चा नहीं करना पड़ता था। वहीं मौजूदा समय में ट्रैक्टर से जुताई करने के लिए रोजाना तय घंटों के लिए करीब 600 रुपए देने पड़ते हैं। इसके अलावा गोपालन से किसान को गोबर गोमूत्र से उत्तम खाद भी मिलती थी। मगर अब अलग से दाम चुका व्यवस्था करनी पड़ती हैं।

जैविक खेती के फायदे
खेतों में फसलों के उत्पादन और उन्हें रोगों से बचाने के लिए जैविक खाद का उपयोग काफी पुराना है। गाय का गोबर खाद के तौर पर रोगों से निदान के लिए दवा के तौर पर नीम के पत्ते और गौमूत्र का छिड़काव करना खेती की पुरानी पद्धति है। रासायनिक खाद पेस्टी साइट के बनिस्पद इनके उपयोग से खर्च भी कम आता है। इसके अलावा नाज में पोषक तत्व रहने के साथ लगातार प्रयोग से भूमि का उपजाऊपन कम नहीं होगा।

जिले प्रदेश में नहीं ठोस नीति
राजस्थानको छोड़कर गुजरात मध्यप्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में जैविक खेती को लेकर ठोस नीतियां बनाई गई हैं। जिससे इन राज्यों में सरकार की ओर से किसानों को जैविक खाद के लिए जरूरी पशुधन, गोबर तथा ग्रीन मेन्योर की व्यवस्था की जा रही है। कृषि विशेषज्ञों की राय में फसल में कीटनाशक के तौर पर गौमूत्र, नीम की पत्तियों नीम के फल का उपयोग किया जा सकता है। पेस्टी साइट की जगह इनका उपयोग करने से ना केवल जमीन की उर्वरक क्षमता बढ़ेगी, बल्कि अनाज में पोषक तत्व भी बने रहेंगे।

एक्सपर्ट व्यू
"सालों पहले जिले में जैविक खेती ही होती थी। प्राकृतिक खाद के तौर पर गोबर कीटनाश के लिए गोमूत्र का उपयोग किया जाता था। खेतों में पेड़ों की भी बाहुल्यता थी, लेकिन अब ट्रैक्टर मशीनरी आने से खेतों में पेड़ों का नामों निशान नहीं है। खेतों में पेड़ों के नीचे पनपने वाली फसल काफी अच्छी होती है। खेतों में डाली जाने वाली जैविक खाद में करोड़ों जीवाणु होते हैं जो भूमि का उर्वरा क्षमता बनाए रखते हैं, मगर तेज गर्मी के दौरान खेतों में पेड़ नहीं होने से जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। पेड़ हों तो सूर्य से पड़ने वाली तेज किरणों से ऐसे जीवाणु खुद को बचा लेते हैं, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। किसान अगर जैविक यौगिक खेती फिर से अपना लें तो उससे उनकी आर्थिक स्थिति तो मजबूत होगी ही, साथ ही अनाज में पोषक तत्व भी बरकरार रहेंगे।" -बीसी माथुर, सेवानिवृत्त कृषि अधिकारी, जालोर

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