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    समाज के गौरव गेनाभाई को पद्मश्री अवॉर्ड से नवाजा

    इस साल जिन्हें पद्म श्री दिए गए उनमें गुजरात का एक खास शख्स भी शामिल था. गेनाभाई पटेल ऐसे इंसान हैं जिनके बारे में प्रधानमंत्री मोदी हों या फिर राहुल गांधी जो भी गुजरात आता है जिक्र जरूर करता है. गुजरात के गेनाभाई पटेल दिव्यांग होते हुए भी देश के किसानों के लिए एक मिशाल के तौर पर उभरे हैं.

    गुजरात के बनासकांठ जिले के लाखणी के गोलिया गांव के रहने वाले दिव्यांग गेनाभाई दरधाभाई पटेल 2004-05 में डीसा में आयोजीत कृषि मेले के दौरान देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से पहली बार मिले थे. मोदी के भाषण से प्रभावित होकर उन्होंने दो पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद कृषि में कुछ करने की इच्छा जताई और उन्होंने आधुनिक तरीके अपना कर अनार की खेती शुरू की.

    दिव्यांग होने कि वजह से हर एक पेड़ पर नजर रख पाएं इसके लिए गेनाभाई ने पूरे खेत में CCTV लगवाया. उन्होंने अनार कि फसल कुछ इस तरह खेत में लगवाई कि वे अपनी ट्रायसकल के जरिए हर एक पौधे तक पहुंच जाएं. वैज्ञानिक तरीके से खेती कर गेनाभाई ने जबरदस्त मुनाफा कमाया. अनार की खेती में जहां पहले 60000 की भी फसल नहीं होती थी, वहीं अब 4 लाख से ज्यादा कि फसल वे हर एक सीजन में लेते हैं.

    अब तक 17 अवार्ड गेनाभाई को अब तक कृषि में गुजरात ओर देश के अलग-अलग मिला कर कुल 17 अवार्ड मिल चुके हैं. गेनाभाई के पुरुस्कारों में 4 नेशनल अवार्ड भी हैं. इसके अलावा राजस्थान में भी अनार कि फसल के लिये तत्कालीनी मुख्यमंत्री अशोक गहेलोत की ओर से 1 लाख का इनाम मिल चुका है. ऐसे में गेनाभाई को पद्मश्री से नवाजा जाना उनके लिए एक सपना सच होने जैसा है.

    आलू उत्पादन में श्री चौधरी ने बटोरी सुर्खियां...

    पार्थी चौधरी, गुजरात के मेहसाना जिले में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के एक पुलिस अधिकारी। पिछले दिनों श्री चौधरी ने आलू उत्पादन में रिकार्ड तोड़ कर खुब सुर्खियां बटोरीं। तीन साल पहले उन्होंने बनासकांठा के जिला मुख्यालय पालनपुर स्थित अपने फार्म हाउस में प्रति एकड़ 87.188 टन आलू का उत्पादन लेकर ये रिकार्ड बनाया था। श्री चौधरी के मुताबिक जिलाधिकारी की भेजी गई एक टीम जिसमें पास ही स्थित दांतिवाड़ा विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ भी शामिल थे, इस रिकार्ड तोड़ उत्पादन के गवाह बने। पुरे इलाके में पुलिस अधिकारी के रिकार्ड तोड़ आलू उत्पादन की इस घटना की खासी चर्चा है। हालांकि गुगल सर्च में आलू के रिकार्ड तोड़ उत्पादन के एक और दावेदार दिखते हैं जो बिहार के हैं और जिनके बारे में कहा जात है कि उसी साल की शुरूआत में उन्होंने प्रति एकड़ 108.8 टन आलू उपजाए थे। आलू उत्पादन को लेकर भारत में गुजरात और पंजाब में औसत उत्पादन प्रति हेक्टेयर 26 टन का है।
    श्री चौधरी 90 एकड़ में फैले अपने फार्म को प्रकृति का कारखाना मानते हैं। उनके लिए कृषि एक औद्योगिक कार्य है जिसमें विभिन्न पहलुओं को देखते हुए विभिन्न प्रक्रमों में बांटा जा सकता है जिससे न केवल अधिकतम वृद्धि सुनिश्चित की जा सके बल्कि जो मिट्टी और बीज से सर्वोत्तम न निकाल पाते हों ऐसे लोगों को हतोत्साहित करके इस प्रक्रम बाहर भी किया जा सके। अपने इस प्रक्रम में उनके मुलाज़िम उनके भागीदार भी हैं : भागीदारी की भावना के तहत उनके मुलाजिम उत्पाद का हिस्सा भी प्राप्त करते हैं। अपने प्रबंधन शैली से अपने भागीदारकों का दिल जीतने के लिए श्री चौधरी ने 100 प्वाइंट का फार्मुला भी तैयार किया है। 70 से उपर स्कोर करने वालों को बोनस और 50 से कम स्कोर करने वालों को जुर्माना भी भुगतना पड़ता है। हालांकि अब तक उनके यहां इस फार्मुले पर सिर्फ विजेता ही मिले हैं।
    अहमदाबाद के राजपथ क्लब में कुछ लोग लेडी रोसैट्टा की चर्चा कर रहे हैं। लेडी रोसैट्टा आलू की उन्नत किस्म है जिसमें शूगर की मात्रा कम है और गुदा ज्यादा। अपने चमकदार चेहरे की वजह से इसे लेडी रोसैट्टा कहते हैं। श्री चौधरी ने राजकोट के चंदुभाई विरानी के बालाजी वेफर्स के लिए अपने आलू उपजाए हैं। पेप्सिको भी अपने कुछ उत्पादों के लिए आलू श्री चौधरी से लेती है। इस वर्ष प्रति एकड़ 67 टन का उत्पादन हुआ है। चौधरी जी बताते हैं कि उनके पास कोल्ड स्टोरेज में फिलहाल 1400 टन माल है। चौदह रुपये प्रति किलो के वर्तमान मूल्य के हिसाब से उनके पास फिलहाल 1.96 करोड़ रुपये का माल है। दुसरे शब्दों में, 120 दिन में 52 लाख रुपये की लागत पर तकरीबन 300 प्रतिशत का मुनाफा।

    बनासकांठा को अंग्रेजी राज के जमाने से आलू की खेती के लिए जाना जाता है लेकिन मैक्डोनॉल्ड्स को दुनिया भर में आलू की सप्लाई करने वाली और खुद भी अपने ब्रांड नाम से वेग्स, फ्राइस और टिक्की बेचने वाली कनाडा की मैक्केन फूड्स ने यहां किसानों को वैज्ञानिक तरीके से आलू की खेती करना सिखाया।  मैक्केन मैक्डॉनाल्डस के आने के बाद 1998 में भारत आई। उन्होंने पंजाब, हरियाणा औऱ उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आलू पर काम किया लेकिन ठंडे मौसम में आलू भारी होता था और उसमें शूगर की मात्रा ज्यादा होती थी जिससे कि उसके लोकप्रिय उत्पाद फ्राइस का रंग बदरंग हो जाता। गुजरात की तरह पश्चिम बंगाल में आदर्श जलवायु उपलब्ध था लेकिन कांट्रेक्ट फार्मिंग को देखते हुए वहां जोत का आकार बहुत ही छोटा था। लिहाज़ा तीन साल पहले कंपनी ने इस तरह के ट्रायल को छोड ही दिया।
    मैक्केन ने गुजरात में कृषि के संदर्भ में बेहद बर्बादी का नजारा पाया। बाढ़ के पानी से सिंचाई की परंपरा थी। लेकिन आलू को नमी चाहिए होता है न कि इतना ज्यादा पानी की पुरी फसल ही पानी में डूबी रही। बस इतना ही पानी आलू को चाहिए जितने में कि मिट्टी और पत्तियों से वाष्प बन कर उड़ जाए। नाइट्रोजनी उर्वरकों का बेहतरहा इस्तेमाल होता था। उच्च आद्रता की वजह से कीटों और फफुंद का भी आक्रमण फसल को झेलना होता था।

    मैक्केन ने स्थानीय किसानों को फव्वारे से सिंचाई करने और जल एवं नाइट्रोजन का इस्तेमाल एक तिहाई तक कम करने के लिए राजी किया। अब ये राज्य में तकरीबन हर जगह दिखते हैं। राज्य सरकार की सब्सिडी और आठ घंटे की बिजली इनको उपलब्ध कराई गई है। सिंचाई के लिए फव्वारे कितने देर तक चलने हैं ये आंकड़ों के आधार पर कंपनी के दो मौसम स्टेशन तय करते हैं जिसमें से पहला राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है और दूसरा साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर में स्थित है। फोन और मोबाइल मैसेज के जरिए फिल्ड स्टाफ किसानों तक सूचनाएं पहुंचाते हैं। अन्य अन्वेषणों की मदद से कोल्ड स्टोरोज में ऊर्जा के उपयोग और बुआई के समय में भी कटौती की है।
    मैक्केन ने साल 2006 में बडगाम गांव के चार किसानों की सोलह एकड़ की जोत से कांट्रेक्ट फार्मिंग की शुरूआत की थी। आज 4500 एकड़ में तकरीबन 900 किसान इसका हिस्सा हैं। इस इलाके के जोत काफी बड़े हैं। इनमें से तकरीबन आधे किसान दस एकड से भी ज्यादा की जमीन रखते हैं। कंपनी के क्रय अधिकारी गोपाल दास शर्मा बताते हैं कि हर किसान चाहे बडी जोत का मालिक हो या छोटी उन्हें हम खुद से जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं। मेहसाना स्थित कंपनी के संयंत्र की क्षमता 50 हजार टन प्रति साल की है जिसे वहीं संयंत्र के अंदर ही काट लिया जाता है।

    नवंबर महीने में जब आलू के सीजन की शुरूआत होती है किसान कंपनी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं कि मार्च के तीसरे सप्ताह तक कंपनी को बीज की मात्रा से दस गुने फसल की आपूर्ति कर दी जाएगी जिसके बाद खरीद की प्रक्रिया रूक जाती है। फसल की गुणवत्ता का पैमाने स्पष्ट कर दिया गया है, आलू की सभी किस्मों के लिए गुजराती भाषा में खेती के अन्य प्रक्रमों के बारे में विस्तार से सारिणी उपलब्ध कराई जाती है, खेती से जुड़े अन्य सलाह फोन पर भी उपलब्ध कराया जाता है। किसानों को बीज आधी कीमत पर उपलब्ध कराई जाती है बांकि आधा फसल की बिक्री के वक्त काट लिया जाता है।

    मैक्केन के साथ काम शुरू करने के कुछ सालों के बाद ही पार्थी चौधरी की तरह ही अन्य किसान भी बहुधा विभिन्न कंपनियों के लिए एक साथ ही आलू उपजाने का कार्य प्रारंभ कर देते हैं। मैक्केन की तरह ही पेप्सिको एवं बालाजी वैफर्स जैसी कंपनियां भी एजेंट के जरिए ही खरीद करती हैं जो सत्र की शुरूआत में ही आलू के खरीद का मूल्य घोषित करती हैं और उन्हीं के मुताबिक एजेंट को भी भुगतान करती हैं। समझौते के मुताबिक अगर आलू की खरीद नहीं हो पाती है तो यही एजेंट खुले बाजार से आलू की खरीद भी करते हैं कंपनियों के लिए।

    कई तरह की परिस्थितियों – मंडी जाने की बजाए किसानों को सीधे बिक्री करने में सक्षम बनाने लायक कानून, खरीददार का विकल्प, नियमित बिजली आपूर्ति और सब्सिडी से जुड़ी कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता, बेहतरीन ग्रामीण सड़कों का जाल, इंटरनेट पर मौजुद सुचनाओं के अथाह सागर तक पहुंच और मोबाइल फोन जैसी सुविधाओं ने किसानों का जीवन बेहतर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    गुजरात में आलू के इस खान में आकर कृषि से जुड़ी कई तरह की पारंपरिक मान्यताओं को आप टूटता देख सकते हैं। आमतौर पर विदेशी और भारतीय पूंजिपतियों के हाथों शोषित किसान, वैश्वीकरण से उपजा कृषि संकट, ग्रामीण इलाकों में आत्महत्या करते किसान, कुछ ऐसे ही तस्वीर देश भर में किसानों की दशा को लेकर पिछले कुछ सालों में बन रही थी जो गुजरात के इस इलाके में आकर एक दूसरे तरह की तस्वीर में बदल जाती है। मानजी भाई चौधरी जैसा छोटा किसान भी यहां पूरी तरह व्यवसायिक है। मानजी भाई गेंहू उपजाने की बजाए बाजार से खरीद कर लाते हैं लेकिन अपने खेतों में सिर्फ आलू ही उपजाते हैं। डेड़ एकड़ से शुरू हुआ उनका सफर आज तेरह एकड़ तक पहुंच चुका है।

    उनके पड़ोसी मेघराजभाई चौधरी को आलू उपजाना मजेदार लगता है जिसका सबुत है कि अपने तीस से पैंतीस एकड़ खेत को उन्होंने इसी काम के लिए रखा है। उनकी समृद्धि का आलम ये है कि अपने फार्म हाउस के उपर उन्होंने तीस फीट उंचा गोदाम बना रखा है।कांतिभाई बेचरभाई पटेल जैसे किसान दो कंपनियों के लिए आलू उपजा कर अपनी आय को अधिकतम करना चाहते हैं। एक सुनिश्चित आय और दूसरी दाम बढ़ने की स्थिति में अत्यधिक मुनाफा कमाने की उम्मीद। रबर और प्लास्टिक तकनीक में एमएससी तक की पढ़ाई करने वाले पटेल मानते हैं कि कॉरपोरेट एजेंसीज अपने हित की वजह से सरकारी एजेंसीज की तुलना में बेहतर ढंग से कृषि तकनीक को बढ़ावा दे सकती हैं। उनकी ही तरह ये कंपनियां भी उत्पादन को बढ़ाने में पुरी दिलचस्पी से लगी हैं। उनकी सलाह से उनका उत्पादन तीन गुना बढ़कर अब 45 टन प्रति हेक्टेयर हो गया है। इस मुनाफे ने उन्हें निजीकरण का अटूट समर्थक बना दिया है।

    कृषि को लाभ के सौदे में बदलते देखकर युवाओं का आकर्षण भी इसके प्रति बढ़ा है। भवेश सैनी ने निरमा इंस्टीच्युट ऑफ टेक्नॉलोजी से केमिकल इंजीनियरिंग की पढाई करने के बाद बंधी बंधाई आय वाली नौकरी करने के बजाए खेती करना बेहतर समझा। मूलत हरियाणा के सैनी को परिवार के साठ एकड़ की जोत में खेती करना अधिक रचनात्मक लगता है। उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने के उद्देश्य से उन्होंने अभी तक विवाह तक करना उचित नहीं समझा। हालांकि उनको कंपनी के बीज थोड़े मंहगे लगते हैं। सैनी को सरकार से मिलने वाले सब्सिडी की तब तक चिंता नहीं होती है जब तक सरकार इलाके जल स्तर को बरकरार रखती है।

    दरअसल ये कृषि का एक ऐसा मॉडल बन कर उभरा है जो दुसरी जगहों पर भी दुसरी फसलों के संदर्भ में भी लागू किया जा सकता है। गुजरात राज्य सरकार ने भी इस पहल को बढ़ावा देने के लिए अपने स्तर पर कई रचनात्मक प्रयास किए हैं।

    ग्रेडिंग मशीन से बचेगी लागत, घटेगा नुकसान और बढ़ेगा लाभ, राजस्थान में ग्रेडिंग मशीन के इस्तेमाल की शुरुआत


    फल-सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। अब बड़े स्तर पर खेती करने वाले किसान कम खर्चे में फल-सब्जियों की ग्रेडिंग करा सकेंगे। इसके लिए सीकर के रसीदपुरा के किसान गोरधन सिंह ने शेखावाटी की पहली ग्रेडिंग मशीन लगाई है। इससे सबसे बड़ा फायदा मशीन से एक साथ तीन काम होंगे। खराब फलों की छंटाई, साइज के अनुसार पैकिंग और मौके पर ही सिलाई की जा सकेगी।
    उद्यान विभाग के सीकर क्षेत्रीय उपनिदेशक हरलाल सिंह बिजारणियां का कहना है कि शेखावाटी में ग्रेडिंग मशीन लगने से फल-सब्जी उत्पादक किसानों को बड़ा फायदा होगा। एक किसान से प्रेरित होकर दूसरे किसान भी अपनाएंगे। दूसरे किसानों के इसे अपनाने से यह संदेश जाएगा कि शेखावाटी के किसान तकनीक अपनाने में आगे रहते हैं।

    थोड़े से खर्चे में मिलेगीफसल की पूरी कीमत

    किसानों को ग्रेडिंग पर थोड़ा सा खर्चा करने पर ही बाजार में फल-सब्जियों की पूरी कीमत मिलेगी। क्योंकि कीमत को देखते हुए हर मशीन पर सरकार के द्वारा अन्य योजनाओं तरह किसानों को अनुदान शुरू कर दिया जाए तो ग्रेडिंग मशीन खरीदना कठीने नहीं होगा।

    प्याज उत्पादक किसानों को होगा बड़ा फायदा

    ग्रेडिंग मशीन आने का सबसे बड़ा फायदा प्याज उत्पादक किसानों को होगा। क्योंकि शेखावाटी बेल्ट प्याज उत्पादन में राजस्थान में दूसरा बड़ा क्षेत्र है। किसानों को ग्रेडिंग के अभाव में प्याज की फसल को मार्केट में ओने-पौने दामों में बेचना पड़ता है। इससे मेहनत के बावजूद लागत मूल्य नहीं मिल पाता।

    लंबे समय से मांग-प्याज ग्रेडिंग और भंडारण बने

    प्याज भंडारण और ग्रेडिंग की समस्या के समाधान के लिए शेखावाटी के किसान लंबे समय से मांग कर रहे है। उपयोगिता को देखते हुए ग्रेडिंग मशीन की खरीद में किसानों को सरकारी मदद की जरूरत है। क्योंकि शेखावाटी के सीकर, चूरू व झुंझुनूं जिले में करीब 25 हजार हैक्टेयर में प्याज की खेती होती है। किसानों का कहना है कि इलाके में सालाना 25 हजार मीट्रिक टन प्याज उत्पादन होता है। ग्रेडिंग मशीन पर सरकार से अनुदान की योजना शुरू किए जाने से किसान बड़े स्तर पर इसका उपयोग कर सकेंगे।
    एक दिन में 10 से 12 टन ग्रेडिंग किसान कम लागत में बड़े स्तर पर प्याज, टमाटर और फलों की ग्रेडिंग करा सकेंगे। मशीन की क्षमता एक दिन में 10 से 12 टन है। कम लागत से इसे दूसरे किसान भी लगा सकेंगे।

    क्या आपको पता हैं आप इस तरह प्रति एकड़ 45 लाख से 1.5 करोड़ रूपए की कमाई कर सकते हैं ??

    मुफ्त में हो सकती है आपकी बेटी की धूमधाम से शादी और बेटे की बड़े कॉलेज में पढ़ाई, सागवान के पेड़ की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग की पूरी जानकारी, प्रति एकड़ 45 लाख से 1.5 करोड़ रूपए की कमाई

    भारत जैसे देश में, और खासतौर पर भारत के ग्रामीण इलाकों में जब किसी घर में बेटी होती है, तो वो उसकी शादी को लेकर बहुत ही ज्यादा परेशान हो जाते है और बेटी के पैदा होते ही उसकी शादी के लिए थोड़ा थोड़ा सामान जोड़ने लगते हैं। 
    लेकिन अगर किसान थोड़ी सी समझदारी दिखाएं, तो उनकी ना केवल ये चिंता दूर हो सकती है बल्कि जबरदस्त कमाई भी हो सकती है। कमाई का जरिया बन सकता है सागवान का पेड़। जी हां, आपने सही पढ़ा। सागवान की खेती आपको वाकई में करोड़पति बना सकती है। कैसे? इसकी पूरी जानकारी आपको इस रिपोर्ट में मिलेगी।

    सागवान कीमती क्यों हैं।

    पिछले कई दशकों में देश के जंगलों में सागवान की कटाई इतनी तेजी से हुई कि अब जंगलों से ये पेड़ गायब ही होता जा रहा है। जबकि सागवान की लड़की की क्वालिटी को देखते हुए इसकी डिमांड दिनोंदिन तेजी से बढ़ रही है। सागवान की लकड़ी को ना तो दीमक लगती है और ना ही ये पानी में सड़ता है। इसलिए सागवान का इस्तेमाल फर्नीचर बनाने में तो होता ही है साथ ही इसका इस्तेमाल पानी के हजारों को बनाने में खासतौर पर होता है। सागवान के पेड़ की उम्र करीब 200 साल होती है।

    सागवान का पौधा कब लगाया जाना चाहिए

    वैसे तो इसे पूरे साल कभी भी लगाया जा सकता है लेकिन परफेक्ट सीजन मार्च से अक्टूबर के बीच ही है। यानी सागवान के पौधे को सर्दी में लगाना सही नहीं होगा। इसके अलावा अगर जमीन, बाढ़ वाले या ज्यादा पाने वाले इलाके में हैं, तो इसको बरसात निकलने के बाद ही लगाना चाहिए।

    लागत कीमती आती है।

    एक एकड़ में पांच बीघा होता है। पांच बीघा यानी एक एकड़ में 500 पेड़ लग जाते हैं। पौधा भी अलग अलग इलाकों में अलग अलग कीमत पर मिलता हैं। सागवान के पेड़ की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग करवाने वाली कंपनी Revolving Earth Agro India Pvt Ltd एक पौधे को 79 रूपए में उपलब्ध करवाती है। इसके साथ 1 साल की 100% रिपलेसमेंट गारंटी भी होती है यानी अगर एक साल में कुछ पौधे किसी भी वजह से खराब या मर जाते हैं तो कंपनी बिना की अतिरिक्त खर्च के आपको उतने पौधे दोबारा उपलब्ध करवाती है।
    सागवान के पेड़ की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग करवाने वाली कंपनी Revolving Earth Agro India Pvt Ltd के निदेशक दिनेश तिवारी का कहना है कि इंटरनेट पर आपको कई ऐसे आर्टिकल्स मिल जायेंगे तो एक एकड़ में 500 के बजाय 800 से लेकर 1000 पौधे लगाने की सलाह देंगे। लेकिन ये गलत है क्योंकि पौधों को 10*9 फीट की दूरी पर लगाना जरूरी है। अगर पौधे 5 फीट की दूसरी पर लगाएं जाते हैं, तो इनको सूरज की रोशनी नहीं मिल पाएगी और पौधे सही तरह से पनप नहीं पायेंगे।

    कमाई कितनी होगी

    सागवान की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग करने वाली कंपनियां औसत 2500 क्यूबिक फीट का रेट देती हैं। एक पेड़ में 10 से 12 क्यूबिक फीट लकड़ी निकल आती है। यानी एक पेड़ की कीमत 12x2500 = 30,000 रूपए होगी। इस हिसाब से एक एकड़ में 500 पेड़ लगाने पर, इनकी कुल कीमत 500x30,000 = 1.5 करोड़ रूपए होगी।

    कितने साल में बिकने लायक हो जाता है

    निदेशक दिनेश के मुताबिक सागवान का टिश्यू कल्चर, ड्रिप इर्रिगेशन से 12-15 साल में तैयार होता है, लेकिन फिर भी अगर 10 साल में पेड़ की गोलाई 3 फीट यानी 36 इंच की हो जाए, तो इसे बेचने लायक समझा जा सकता है।

    किन किन राज्यों में इसकी अच्छी फसल होती है।

    वैसे तो कहीं भी लगाया जा सकता है लेकिन भारत में बर्फ वाले राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में इसे नहीं लगाया जा सकता है। इसके अलावा, समुद्र किनारे बसे शहरों में समुद्र से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर लगाने पर ही सागवान लग सकता है।

    कितने पानी की जरूरत होती है

    जब पौधा छोटा होता है तो पहले एक महीने तक इसे रोजाना पानी की जरूरत होती है। मानसून में बरसाती पानी काफी होता है और सर्दी के मौसम में महीने में एक बार ही पानी देना पड़ता है। एक साल के बाद हफ्ते में एक बार पानी देने की जरूरत पड़ती है।

    क्या सागवान के साथ दूसरी फसल लेना संभव है

    ये बिल्कुल संभव है। आप अगर अपने खेत पर कोई फसल लगाने के साथ साथ सागवान के खेती भी करना चाहते हैं तो आपको खेत की मेड़ पर सागवान का पौधा लगाना होगा। एक एकड़ खेत की मेड़ की औसत लंबाई चौड़ाई 200 गुणा 220 की होती है, जिस पर करीब 150 पौधे लगाए जा सकते हैं। लेकिन मेड़ पर पौधे 10 गुणा 9 फीट की दूरी पर नहीं बल्कि 5-5 फीट की दूरी पर लगेंगे। यानी आप अपनी प्रमुख फसल के साथ साथ सागवान की फसल का भी भरपूर फायदा उठा सकते हैं। 150 पेड़ 30,000 रूपए प्रति पेड़ करीब 10 साल के बाद 45 लाख रूपए के हो होंगे।

    मिट्टी की जांच

    जिस खेत पर आप सागवान का पेड़ लगाना चाहते हैं उसकी मिट्टी की जांच पहले जरूर करवा लें। मिट्टी की जांच रिपोर्ट अगर पीएच वेल्यू (PH Value) 6.50 से 8.50 के बीच होती है, तभी आप सागवान का पौधा लगाएं।

    सागवान को किससे है खतरा

    सागवान के पौधे को उस जमीन में बिल्कुल ना लगाएं, तो पानी से भरा रहता है। इसके अलावा, इसे कीड़ा लगने और दीमक का भी खतरा रहता है। ध्यान रहे कि सागवान के पौधे को दीमक लग सकती है लेकिन जब ये कटकर फर्नीचर में बदल जाता है तो इसके दीमक नहीं लगती। इन सभी से बचने के लिए कॉन्ट्रेक्ट करने वाली कंपनी ट्रेनिंग देती है।

    खरीदेगा कौन

    इसे बेचने के दो तरीके हैं – पहला किसी कंपनी के साथ कॉन्ट्रेक्ट कर लिया जाए और दूसरा बुलंदशहर जैसे खुले बाजार में इनको बेचा जाए।
    अगर आपके पास पहले से सागवान के पेड़ लगे हुए हैं और अब वो 10 साल से ज्यादा के हो गए हैं और आपने किसी कंपनी से पहले से कॉन्ट्रेक्ट भी नहीं किया है, तो आप या तो इनको खुद बुलंदशहर के खुले मार्केट में बेच सकते हैं या फिर सागवान के पेड़ खरीदने वाली Revolving Earth Agro India Pvt Ltd जैसी कंपनियों से संपर्क कर सकते हैं। 

    क्यों है फलों की खेती का सुनहरा भविष्य, पेप्सी और कोका-कोला की मांग बहुत ज्यादा गिरी

    देश के किसी भी शहर या गांव की दुकान पर आपको पेप्सी और कोका कोला की बोतलें रखी मिल जाती है। लेकिन शायद आपने गौर नहीं किया कि अब इनकी जगह तेजी से जूस की बोतले ले रही है। नए आंकड़े इस तस्वीर को सच भी साबित करते हैं। लेकिन ये खबर किसान मित्रों के लिए अच्छी कैसे हैं।
    आंकड़े जानने से पहले आप ये जान लें, कि देश और दुनिया में अगर फलों के जूस का बाजार बढ़ता है तो कंपनियों को फलों की बेतहाशा जरूरत पड़ेगी और जिनकी पूर्ति सिर्फ किसानों के खेतों से ही हो सकती है। इसलिए पेप्सी और कोला कोला के ड्रिंक्स की गिरती मांग और फ्रूट जूस के बढ़ती मांग से किसानों को ही आखिरकार फायदा होना है। इसलिए अगर आप फलों की खेती करते हैं तो इसे करते रहिए और अगर आप फलों की खेती का मन बना रहा है और फिर मन पक्का कर ही लीजिए।

    अब देखिए कि ताजा आंकड़े क्या कह रहे हैं।

    नीलसन के डेटा के मुताबिक, इस साल के पहले 6 महीनों में रियल, स्लाइस और ट्रॉपिकाना जैसे जूस ब्रांड्स सबसे ज्यादा बिकने वाले 5 बेवरेजेज में पेप्सी और कोक के फिजी ड्रिंक्स से आगे निकल गए। हालांकि, ये आंकड़े सिर्फ मॉडर्न ट्रेड के हैं। इससे उस ग्लोबल ट्रेंड की पुष्टि होती है कि कन्जयूमर्स धीरे-धीरे कोक-पेप्सी के कोल्डड्रिंक्स के मुकाबले स्वास्थ्य के लिए अच्छे बेवरेजेज को पसंद कर रहे हैं। अब इनकी ग्रोथ घटकर सिंगल डिजिट यानी 4-6 पर्सेंट रह गई है।
    नीलसन के डेटा के मुताबिक, डाबर का रियल (Real), पेप्सिको का स्लाइस मैंगो ड्रिंक (Slice mango drink) और ट्रॉपिकाना जूस मॉडर्न ट्रेड में ज्यादा बिकने वाले टॉप 5 बेवरेजेज में शामिल है। ये प्रॉडक्ट्स कोक और पेप्सी से भी आगे निकल चुके हैं। मॉन्डेलेज का टैंग पाउडर ड्रिंक और हमदर्द का ड्रिंक रूहअफजा भी टॉप बेवरेजेज में शामिल हैं। चार साल (जनवरी-जून 2013 से जनवरी-जून 2016 ) के आंकड़े दिखाते हैं कि 2013 और 2014 में पेप्सी मॉडर्न ट्रेड में सबसे ज्यादा बिकने वाला ब्रांड था, वहीं पिछले साल कोक टॉप 5 ब्रांड्स में शामिल था। इस साल रियल के 8 पर्सेंट हिस्से की तुलना में कोक का मार्केट शेयर 4 पर्सेंट रहा।
    नीलसन के अधिकारियों ने साफ किया कि यह डेटा सिर्फ मॉडर्न ट्रेड का है। जनरल ट्रेड में बड़े पैमाने पर फिजी (कोल्ड) ड्रिंक्स की बिक्री में बढ़त हो सकती है। फ्यूचर ग्रुप के प्रेजिडेंट और FMCG देवेंद्र चावला ने बताया, ‘पारंपरिक ड्रिंक्स और स्वाद का जमाना लौट आया है। पिछले कुछ दशकों में बेवरेजेज के ग्लोबल ब्रांड्स ने मार्केटिंग पर जमकर पैसा बहाया, लेकिन कन्जयूमर्स अब फिर से वही पसंद कर रहे हैं, जिसे वे सेहतमंद और पारंपरिक स्वाद वाला मानते हैं।
    "ऑनलाइन सुपरमार्केट इकाई Bigbasket.com के को-फाउंडर विपुल पारेख ने भी इस ट्रेंड की पुष्टि की. उन्होंने बताया, 'जूस की ग्रोथ कोल्ड ड्रिंक्स के मुकाबले है 2.5 गुना ज्यादा. हम पिछले 6 महीनों से इस ट्रेंड को देख रहे हैं. ग्राहकों का झुकाव अब सेहतमंद फूड और बेवरेजेज की तरफ बढ़ है रहा"
     डाबर के जूस ब्रांड, रियल की सेल्स 1,000 करोड़ को पार कर गई है। कंपनी ने 1998 में इस ब्रांड को लॉन्च किया था। कंपनी के सीईओ सुनील दुग्गल ने इसकी सफलता का कारण कुछ इस तरह बताया, ‘इसके फ्लेवर के 30 वैरिएंट्स हैं। हम ऐसा टेस्ट तैयार करने की कोशिश की है, जो भारतीयों की पसंद के मुताबिक हो।

    सफेद प्याज की नई किस्म अकोला में किसानों को करा रही है लाखों की कमाई, प्रति एकड़ रू 2.50 लाख तक का लाभ


    महाराष्ट्र के बाहर के ­बहुत ही लोगों को ये पता हो कि महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में लाल नहीं बल्कि सफदे प्याज को ज्यादा पसंद किया जाता है। ICAR के प्याज और लहसुन अनुसंधान निदेशालय (ICAR-Directorate of the Onion and Garlic Research) 2013 में सफेद प्याज की एक ऐसी किस्म विकसित की, जो अब विदर्भ के सैकड़ों किसानों के लिए जबरदस्त कमाई का जरिया बन गया है। सफेद प्याज की इन नई किस्म का नाम है भीमा शुभ्रा।
    अप्रैल 2013 में एक कार्यशाला के दौरान सफेद प्याज की भीमा शुभ्रा किस्म को कुछ किसानों को दिया गया। भीमा शुभ्रा प्याज की रोपाई खरीफ के दौरान 110 से 115 दिनों में होती है जबकि पछेती खरीफ (खरीफ की फसल के दौर का आखिरी कुछ दिन) में 120-130 दिनों में ये फसल परिपक्व होती है।
    महाराष्ट्र के अकोला जिले के एक किसान हैं नामदेवराव अढाऊ। इन्होंने अनुसंधान से इस किस्म का 5 किलो बीज खरीदा और अनुसंधान की गाइलाइंस के मुताबिक उसने 1.25 एकड़ में उठी क्यारियों पर प्याज की फसल को उगाया। उन्होंने समान आकार के साथ जोड़ एवं तोर कन्दों से रहित अच्छी गुणवत्ता के विपणन योग्य कन्द की चौंका देने वाली 21 टन प्रति एकड़ की उपज हासिल की, जिसे बेचकर उन्हें 2.50 लाख रूपए का लाभ हुआ।
    सफेद प्याज की भीमा किस्म से मिली इस हैरतअंगेज सफलता के बाद किसान नाममदेव ने आप पास के बाकी किसानों को भी इससे जोड़ा। नतीजा अब 12 गांवों के करीब 300 किसानों का एक ग्रुप 750 एकड़ पर भीमा सफेद प्याज का उत्पादन कर रहा है। इससे ज्यादातर किसान 1 लाख रुपए प्रति एकड़ का लाभ कमा रहे हैं। किसान नामदेव की किसानों को जोड़ने और खेती में जबरदस्त कमाई के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी नागपुर में एक प्रोग्राम में तारीफ कर चुके हैं। 

    लागत और कमाई

    किसान नामदेव के मुताबिक प्रति एकड़ लागत करीब 40 हजार से 45 हजार रूपए आती है, जिसमें नर्सरी बनाना, बीज खरीदना, गोबर, रासायनिक और पानी इत्यादि की कीमत शामिल होती है। बीज करीब 2200 प्रति किलो आता है। नामदेव के मुताबिक वैसे तो एक एकड़ में 3 किलो बीज लगता है लेकिन अगर सही ढंग से नर्सरी तैयार की जाए तो सिर्फ 2 किलो बीज की ही एक एकड़ के लिए जरूरत पड़ेगी।
     रामदेव के मुताबिक पहले 2 साल इसमें बंपर पैदावार है होती. रामदेव को पहले 2 साल 200 से 210 कुंटल प्रति एकड़ पैदावार हुई. उसके बाद औसतन है 150 कुंटल की पैदावार होती. पिछले साल ये 3000 रूपए प्रति कुंटल तक बिका था.
    भीमा सुपर रेड के मुकाबले भीमा शुभ्रा 2-3 रूपए प्रति किलो ज्यादा रेट में बिकता है। मौजूदा भाव 2400-2500 रूपए प्रति कुंटल है। विदेशों में इसका पाउडर बनाकर बेचा जाता है।
    नामदेव के पास कुल 22 एकड़ जमीन है, लेकिन इस फसल को पानी की जरूरत होती है इस वजह से वो सिर्फ 4 एकड़ पर ही ये फसल करते हैं।

    बाजरा : बिजाई के बाद रोग से बचाव के उपाय भी जरूर करें


    बारिश के दौर में खरीफ की फसल के लिए बिजाई का कार्यक्रम लगभग पूर्ण होने की ओर है। अब फसलों की देखभाल और रोगों से बचाव पर किसानों को ध्यान देने की जरूरत है। खासतौर से बाजरे की फसल की। बाजरा ही प्रदेश में मुख्य खाद्यान फसल के रूप में माना जाता है। कम बारिश में भी किसानों के घर खाने लायक उपज हो जाती है और राज्य के मौसम से वाकिफ लोग इसी से संतोष कर लेते हैं। इसी कारण पूरी फसल को लेना जरूरी हो जाता है। 

    बाजरें में यह लगते हैं रोग 
    हरित बाली रोग : बाजरे में मुख्य रूप से हरित बाली रोग लगता है। इसे तुलासिता और अंग्रेजी में डाउनीमिलड्यू रोग भी कहा जाता है। बिजाई के 25 से 35 दिन बाद में और कुछ स्थानों पर एक से डेढ़ माह बाद रोग के लक्षण दिखते हैं। इस रोग की पहचान करने के लिए बाजरे की पत्तियों को उलट कर देखना चाहिए। इन पत्तियों के निचली सतह पर सफेद पाउडर दिखाई देने लगता है। इन पत्तियों पर कई बार उलझे हुए बालों जैसी संरचना दिखती है। ऊपर से सफेद लाइनें भी दिखेंगी। इसकी रोकथाम के लिए बीजोपचार कर लेना चाहिए।
    ज्यादाबारिश से ब्लास्ट रोग : ज्यादा बारिश होने की दशा में बाजरे में ब्लास्ट रोग होने की आशंका रहती है। इस रोग पहचान बाजरे के पौधे की पत्तियों पर नाव के आकार के धब्बे से होती है। रोग की उग्रता होने पर ये चिह्न पौधे के तने पर भी देखे जा सकते हैं। इस रोग पर अभी दुर्गापुरा स्थित अनुसंधान संस्थान में शोध चल रहा है और दो साल में दवा के उपयोग के अच्छे परिणाम देखने में रहे हैं।
    •  बाजरा ही नहीं किसी भी फसल को रोगों से बचाव की शुरुआत बीजों के उपचार से शुरू ही होती है। बीजोपचार करने से फसल में आधे रोगों की समस्या पहले से ही समाप्त हो जाती है। जिन किसानों ने अब तक बिजाई नहीं की है, वे उन्नत किस्म के बीज लेकर उनका उपचार करें। अप्रोन एसडी 35 को 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से इस्तेमाल कर बीजोपचार कर सकते हैं। 
    •  दुर्गापुरा स्थित राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान के बाजरा अनुसंधान परियोजना पौध व्याधि विभाग के वरिष्ठ तकनीकी सहायक डॉ. रिद्धि शंकर शर्मा ने बताया कि रोग के लक्षण दिखने पर इसका तत्काल उपचार करना चाहिए। इसके लिए रिडोमिल एम.जेड. 0.2 प्रतिशत ( दो ग्राम दवा एक लीटर) पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिड़काव करना चाहिए। अगर ये दवा उपलब्ध हो तो मेंकोजेब 0.2 प्रतिशत दवा का पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल पर छिड़काव करना चाहिए। इस छिड़काव के बाद वैसे तो रोग से मुक्ति मिल जाएगी, अगर मिले तो 12 से 15 दिन के अंतराल सेदुबारा छिड़काव किया जा सकता है। 

    साभार एग्रो भास्कर  

    क्या वाकई नीम के दातुन की कीमत 65 रूपये


    अगर आप किसी गांव या किसी कस्बे या फिर किसी छोटे शहर में रहते हैं, तो निश्चित तौर पर आपके घर में ही या फिर घर के बहुत ही नजदीक कोई ना कोई नीम का पेड़ तो जरूर लगा होगा। और अगर आप किसी लखनऊ, सूरत जैसे किसी शहर में रहते हैं तो आप अपनी कार जिस पेड़ के छाव में पार्क करते हैं, वो नीम का पेड़ हो सकता है। कहने का मतलब है कि जिस नीम के पेड़ को आप घर की मुर्गी दाल बराबर समझते हैं वो अब यूरोप और अमेरिका में लाखों की कीमत वाला पेड़ बन चुका है।
    भारत तो अमेरिकियों के कॉलगेट से दांत साफ करने की आदत डाल चुका है लेकिन अब खुद अमेरिकी लोग भारतीय दातून यानी नीम के पेड़ की छोटी छोटी डंडियों (AUDREY CHEW STICKS NEEM TOOTHBRUSH NATURAL HEALTHY) से अपने दांत साफ कर रहे हैं। हैरत में पड़ने की जरूरत नहीं। ये 100 प्रतिशत सच हैं। अमेरिका के मॉल्स में ये दातून कोई 1-2 रूपए में नहीं बल्कि सौकड़ों रूपए में बिक रहे है।
    विदेशों में अब इसका कारोबार कई हजार करोड़ रूपए का हो चुका है। दिल्ली में बैठे कुछ एजेंट्स के जरिए इनको अमेरिका और यूरोप के बड़े देशों जैसे जर्मनी, रूस में खूब एक्सपोर्ट किया जा रहा है। जैसे जैसे इनकी विदेशों में डिमांड बढ़ रही है वैसे वैसे कई विदेशियों ने खुद अपने ही घरों में नीम के पेड़ को लगाना भी शुरु कर दिया है।
    कुछ भारतीयों ने तो अब इसे Ebay जैसी बहु राष्ट्रीय वेबसाइट्स के जरिए भारत में रहते हुए ही विदेशों में बेचना भी शुरु कर दिया है। ऐसी वेबसाइट्स पर इनकी कीमत करीब 10 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 65 रूपए का एक पैकेट है। एक पैकेट में 10 दातून होते हैं। यानी एक दातून की कीमत 65 रूपए हैं, जो कि कॉलगेट के मुकाबले कई गुना ज्यादा महंगी बिकती है जबकि इसकी लागत कुछ भी नहीं है। यानी हींग लगे ना फिटकरी, रंग भी चोखा।
    भारत में क्या स्थिति है।
    भारत में जो लोग अपनी सेहत को लेकर जागरूक है वो भी दातून से अपने दांत साफ करने लगे हैं। उनको ये दातून चौराहों, रेलवे स्टेशनों के किनारे दस रुपए के तीन मिल जाते हैं।
    क्या खास है दातून में
    नीम के दातून में अज़ाडेरेक्टिन (Azadirachtin) नामक प्राकृतिक रासायनिक तत्व होता है, जिसके जीवाणुओं से लड़ने की क्षमता को चिकित्सा जगत ने भी माना है। मुंह में खाने के अवशेषों के कारण सबसे ज्यादा कीटाणु पनपते हैं जो मसूड़ों और दातों से संबंधित तमाम बीमारियों का कारण बनते हैं, नीम का दातून इन सब से निपटने में कारगर है। पश्चिमी देशों ने यह बात समझ ली है।

    करोड़ों की कमाई कराने वाली चंदन की खेती कैसे करें, पूरी रिपोर्ट


    देश में चंदन अगर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा तो वीरप्पन की वजह से। वही वीरप्पन जिस पर रंगीला, सत्या, सरकार जैसी बड़ी सफल फिल्में बनाने वाले फिल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने हाल में वीरप्पन फिल्म बनाई और करीब एक दशक पहले वीरप्पन को मारने के लिए सरकार को अपनी पूरी ताकत झोंक देनी पड़ी क्योंकि दुनिया में चंदन का सबसे बड़ा तस्कर वीरप्पन ही था। द.भारत के जंगलों से चंदन की चोरी करके वो विदेशों में तस्करी करके अरबों रूपया कमाता था।
    लेकिन एक आम इंसान भी बिना किसी चोरी या डर के कम लागत पर चंदन की खेती करके करोड़ों कमा सकता है। यहां हम चंदन की खेती से जुड़ी पूरी जानकारी दे रहे हैं। अगर फिर भी कोई सवाल आपके मन में आता है, तो खबर के अंत में Comment बॉक्स में अपना सवाल लिख सकते हैं। चंदन की खेती के एक्सपर्ट्स आपके सवालों के जवाब देंगे।

    भारतीय चंदन की विदेशों में मांग

    चंदन की खुशबू हर किसी का मन मोह लेती है। आंतरराष्ट्रीय बाजार मे बेहद बढती मांग और सोने जैसे बहुमुल्य समझे जाने वाले रक्त चंदन की ऊंची कीमत होने के कारण भविष्य मे चंदन की खेती करना बहुत फायदे का व्यवसाय साबित हो सकता है। और देशो के तुलना में भारत मे पाये जाने वाले चंदन के पेड़ में खुशबू और तेल का प्रमाण (1% से 6%) सबसे ज्यादा है। इसी वजह से भारतीय चंदन की आंतरराष्ट्रीय बाजार मे बडी मांग है। भारत में मौजूदा दौर में रक्त चंदन रसदार लकड़ी (Hart wood) की कीमत औसत कीमत 6000 से 7000 रुपये प्रति किलो है। सूखी लकड़ी (Dry wood) 2000 रुपये प्रति किलो और बारीक लकड़ी 200 रुपये किलो है।

    पौधे का परिचय 

    सामान्य नाम : चंदन, वैज्ञानिक नाम : Pterocarpus Santalinus, Santalum Album, श्रेणी : सुगंधीय

    उपयोग 

    चंदन का उपयोग तेल, इत्र, धूप, औषधी और सौंदर्य प्रसाधन के निर्माण में और नक्काशी में किया जाता है। चंदन तेल, चंदन पाउडर, चंदन साबुन, चंदन इत्र। 
    उपयोगी भाग : लकड़ी, बीज, जड़ और तेल

    उत्पत्ति

    यह मूल रुप से भारत में पाये जाने वाला पौधा है। भारत के शुष्क क्षेत्रों विंध्य पर्वतमाला से लेकर दक्षिण क्षेत्र विशेष रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु में में पाया जाता है। महाराष्ट्र में विदर्भ की जमीन चंदन खेती के लिए बहुत अच्छी साबित होगी। लेकिन अब गुजरात जैसे कुछ राज्यों में भी ये खेती होने लगी है। वहां एक किसान ने करीब 15 साल पहले चंदन के पौधे लगाए थे जो अब बाजार में बिगने के लिए तैयार हैं और इनकी कीमत करीब 15 करोड़ रूपए हैं। इसके अलावा यह इंडोनेशिया, मलेशिया के हिस्सों, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी पाया जाता है।

    भूमि 

    • चंदन पेड़ मुख्य रूप से काली लाल दोमट मिट्टी, रूपांतरित चट्टानों में ऊगता है।
    • खनिज और नमी युक्त मिट्टी में इसका विकास कम होता है।
    • उथले, चट्रटानी मैदान पथरीली बजरी मिट्टी, चूनेदार मिट्टी सहन करते है।
    • कम खनिज युक्त मिट्टी में चंदन तेल की उपज बेहतर होती है।
    • समुद्र सतह से 600 से 1200 मीटर की ऊँचाई पर अच्छा पनपता है।
    • चंदन 5 से 50 सेल्सीयस (Celsius) तापमान मे भी आता है।
    • 7 से लेकर 8.5 पीएच मिट्टी की किस्म में उगाया जा सकता है।
    • 60 से 160 से.मी के बीच वाले वर्षा क्षेत्र चंदन के लिए महत्वपूर्ण होते है।
    • किसी भी प्रकार के जल भराव में चंदन का पेड़ पूरी तरह से पनप नहीं पाता।
    • इसे दलदल जमीन पर नहीं उगाया जा सकता है।

    भूमि की तैयारी

    • पानी की अगर सही व्यवस्था हो तो साल में कभी भी लगा सकते है।
    • पेड़ लगाने से पहले गहरी जुताई की आवश्यकता होती है।
    • 2-3 बार जोतकर मिट्टी क्षमता को बढ़ाया जाता है।
    • 2 x 2 x 2 फिट का गढ्ढा बनाकर ऊसे सुखने दिया जाता है।
    • मुरखाद कंपोस्ट खाद का ईस्तेमाल किया जा सकता है।
    • 10 x 10 फिट के दूरी पर पेड़ लगाये
    • 1 एकड़ में 430 पेड आते है।

    खाद एवं सिंचाई प्रबंधन :

    • इसे अधिक उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है।
    • शुरुआती दिनो में फसल वृद्धि के दौरान खाद की आवश्यकता होती है।
    • मानसून में पेड़ तेजी से बढ़ते है पर गर्मियों में सिंचाई की जरुरत होती है।
    • ड्रिप विधि से सिंचाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
    • सिंचाई मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता और मौसम पर निर्भर करती है।
    • शुरुआती दिनो में मानसून के बाद दिसम्बर से मई तक सिंचाई करे । 

    कटाई (Harvesting) तुडाई,फसल कटाई का समय 

    • चंदन की जड़े भी सुगंधित होती है। इसलिए पेड़ को जड़ से उखाडा जाता है न कि काटा जाता है।
    • पांचवे साल से रसदार लकड़ी बनना शुरु होती है।
    • चंदन की लकडी मे दो भाग होते है रसदार लकड़ी (Hart wood) और सूखी लकड़ी (Dry wood) दोनों की कीमत अलग – अलग होती है।
    • जब पेड़ लगभग 12 – 15 साल पुराना हो जाता है तब लकड़ी प्राप्त होती है और पेड के जीवन पर्यन्त तक प्राप्त होती रहती है।
    • जड़ से उखाडने के बाद पेड़ को टुकड़ो में काटा जाता है और डिपो में रसदार लकड़ी (Hart wood) को अलग किया जाता है।

    चंदन खेती का अर्थशात्र

    रक्त चंदन धीरे धीरे बढने वाला पेड़ है, लेकिन समुचित जल प्रबन्धन करने पर जैसे ठिंबक सिंचन इस्तेमाल कर हर साल पेड़ के तने का घेरा 5 से.मी. से बढा सकते है। 12 से 15 साल बाद जमिन से 5 फिट ऊपर तने का घेरा 80 से.मी. हो तो ऊस रक्त चंदन के पेड़ से 20 से 30 किलो (Hart wood) मिल सकता है।
    आज (Hart wood) का मार्केट रेट प्रति किलो रु.6000 से 7000 है और अगर 12-15 साल बाद का रु. 7000 रेट भी मानते है और रसदार लकड़ी (Hart wood) 20 किलो भी मिलता हो तो 1 पेड से रु. 1,40,000 मिल सकते है, 1 एकड से 400 x 1,40,000 = रु. 5,60,00,000 (पांच करोड साठ लाख रुपये) प्रति एकड़ केवल रसदार लकड़ी (Hart wood) से मिल सकता है। बाकी बची लकडी और जडो का मुनाफा अलग होगा ।
    1 एकड जमीन मे सिर्फ धुरे पर भी 125 पेड़ के 125 x 1,40,000 = रु. 1,75,00,000 लगभग ( एक करोड़ पच्चतर लाख रुपये) बना सकते है।

    अब आप भी कर सकेंगे अफीम की खेती, ना होगा पुलिस का डर और ना ही नारकोटिक्स विभाग


    अफीम की खेती का लाइसेंस अब ऑनलाइन मिलेगा
    अफीम की खेती की ओर लोग सबसे ज्यादा आकर्षित होते हैं। वजह सीधी सी है बहुत ही कम लागत में छप्पर फाड़ कमाई होती है। वैसे तो देश में अफीम की खेती गैरकानूनी है लेकिन अगर इसे नारकोटिक्स विभाग से स्वीकृति लेकर किया जाए, तो फिर आपको कोई डर नहीं। 
    देश में संभवत पहली बार कोई राज्य सरकार अफीम की खेती के पट्टे अब ऑनलाइन देने की नई शुरुआत कर रही है। मध्य प्रदेश सरकार ने ये पहल की है। किसानों को अफीम की खेती के पट्टे वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए नारकोटिक्स विभाग प्रक्रिया ऑनलाइन करने जा रहा है। हर किसान के खाते को आधार से लिंक करना शुरू कर दिया है। अगर सबकुछ ठीक रहा तो अगले सीजन यानी 2017 से किसानों को पट्‌टों का वितरण आॅनलाइन किया जाएगा।
    नारकोटिक्स विभाग ने राज्य के मंदसौर, नीमच, रतलाम के सभी किसानों को आधार कार्ड की फोटोकाॅपी कार्यालय में जमा करने के निर्देश दिए हैं। आधार नंबर से ही किसानों की कोडिंग की जाएगी। 2015-16 में विभाग ने 18651 किसानों को पट्टे जारी किए थे। आधार कार्ड की कॉपी मुखिया के माध्यम से विभाग में जमा होगी।
    खंड 2 अफीम अधिकारी व्यासजी शुक्ल ने बताया आयुक्त कार्यालय से मिले निर्देश के बाद सभी किसानों के आधार नंबर लिए जा रहे हैं। खंड 3 के अफीम अधिकारी एस.पी. सिंह ने बताया प्रक्रिया शुरू हो गई है पुराने किसानों के रिकाॅर्ड मुख्यालय भेजे जा रहे हैं। 1998 से लेकर अब तक प्रदेशभर में अफीम किसानों की जानकारी फीड की जा रही है। काम खंड स्तर पर एक माह से जारी है।

    ये होगा फायदा : किसान और विभाग दोनों को मिलेगी सुविधा

    अफीम काश्तकारों के खाते आधार से लिंक करने के बाद किसान व विभाग दोनों के लिए ही सुविधाजनक होगा। किसान सभी जानकारी कहीं से भी ऑनलाइन प्राप्त कर सकेगा। पट्टा वितरण भी ऑनलाइन होगा। विभाग को भी एक क्लिक पर संबंधित किसान की सारी जानकारी मिल सकेगी।

    स्वाद में कड़वा नीम अब किसानों को देगा मीठा फल, इफको की बड़ी योजना


    फ़र्टिलाइज़र की सबसे बड़ी सहकारी कंपनी इफको ने अभी हाल ही में NPK का दाम घटाए थे। इफको अब किसानों के लिए एक बड़ी योजना लेकर आया है, जो किसानों की कमाई बढ़ाने में बड़ी कारगर साबित होगी।
    किसानों के लिए इस साल फिर एक बड़ी ख़ुशख़बरी लाई है। दरअसल इफ्को ने इस साल इलाहाबाद में नीम आधारित कारखाना लगाने की शुरुआत की है। इस कारखाने में नीम के  निमोरियों  से तेल निकाला जाएगा।
    इसमें रोज़ाना २२ टन निमोरियों  से २ टन नीम का तेल निकाला जायेगा। इसके अतिरिक्त इन निमौलियों का उपयोग यूरिया उत्पादन में भी होगा। इफ्को ने नीम कारखाने में उपयोग में लाये जाने वाले  निमोरियों  को किसानों से ही खरीदने का फैसला किया है। इसके लिए इफ्को पूरे देश में कई स्थानों पर ‘निमोरी सेन्टर’ खोलेगी, जहाँ पर किसान 15 रुपये / किग्रा के दाम पर  निमोरियों  को बेच सकेंगे।

    इसके अलावा, जुलाई के महीने में इफ्को ने पूरे देश भर के किसानों मे ५ लाख नीम के पौधे मुफ़्त बांटने की योजना बनाई है। इफ्को के इस कदम से ‘एक तीर से कई निशानें’ ताके जाएंगे। नीम का पेड़ वायु और वातावरण को शुद्ध करता है और निमोरियाँ  जो प्रतिदिन कूड़े में फेकीं जाती हैं उनका भी उपयोग होगा। नीम से बना यूरिया मिट्टी की सेहत के लिए लाभकारी है मिट्टी को कीड़े लगने से सुरक्षा प्रदान करेगा। इस तरह औषधि-गुण वाला नीम किसानो के लिए कमाई का जरिया भी बनेगा।

    कहां मिलेंगे इसके पौधे 

    जो किसान इस योजना का लाभ उठाना चाहते हैं, वो कृप्या अपने नजदीकी इफको ऑफिस में संपर्क कर सकते हैं।

    7 वीं पास किसान 7 महीने में कमाता है 1 करोड़ का मुनाफा



    रायपुर। हरी मिर्च की खेती ने बस्तर क्षेत्र के मालगांव में रहने वाले जगन्नाथ राय और उनके परिवार को समृद्ध कर दिया है। राय अपने 5 भाइयों के साथ मिलकर खेती करते हैं। पिछले सीजन उन्होंने 50 एकड़ खेत में मिर्च की खेती कर रिकार्ड बना दिया है। 7 महीने की फसल में अब तक 1 हजार टन से अधिक की मिर्च बेचकर वे 1 करोड़ से अधिक का मुनाफा कमा चुके हैं। बड़ी बात ये है कि वे केवल 7वीं पास हैं।

    30 एकड़ से ज्यादा जमीन किराए पर ली है

    राय ने बताया कि उनके पास 20 एकड़ जमीन है, बाकि के 30 एकड़ खेत वे किराए पर लेते हैं, इसके लिए हर साल 15-20 हजार रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से किराया देते हैं। गांव वालों की मानें तो किराए पर खेती को लेकर जगन्नाथ की पहले कोई रूचि नहीं थी। जब उन्हें सब्जियों की खेती से ज्यादा मुनाफा होने लगा तो उन्होंने गांव वालों से किराए पर जमीन लेना शुरु किया।


    मल्चिंग तकनीक से समय और पैसे की बचत

    जगन्नाथ के पास अब ट्रैक्टर, रोटर, कल्टीवेटर, थ्रेशर, केजविल जैसे आधुनिक साधन हैं। वहीं वे मल्चिंग तकनीक से पैदावार ले रहे हैं जिसमें मिट्टी को पॉलीथिन से ढंक दिया जाता है। पॉलीथिन में जगह-जगह छेद होते हैं, जिसमें पौधे रोपे जाते हैं। इस तकनीक से पैसे के अलावा समय की भी बचत होती है।

    7 एकड़ से की थी शुरुआत

    7 वीं पास जगन्नाथ ने बताया कि उन्होंने 15 साल पहले मिर्च की खेती शुरू की थी। उन्होंने 7 एकड़ में मिर्च की फसल लगाई थी। उम्मीद से अधिक फायदा होने पर साल दर साल यह रकबा बढ़ता गया जो आज करीब 50 एकड़ तक पहुंच गया है। उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर पर मिर्च की खपत कम होने के चलते वे इसे रायपुर और नागपुर तक भेज रहे हैं जहां पर रेट अच्छा होने से लाभ भी उम्मीद के मुताबिक मिल रहा है। जगन्नाथ इस समय सरकारी की बजाय वीएनआर 435 प्रजाति के बीज का उपयोग कर रहे हैं जिसे लेकर अब तक कोई शिकायत उन्हें नहीं मिली है। ब्लाक में पदस्थ उद्यानिकी विभाग के आरएईओ जीके हड़ेऊ ने बताया कि पिछले साल इस किसान ने 1200 टन से अधिक मिर्च उत्पादन किया था।


    अनुदान, बीज दोनों उपलब्ध

    उद्यानिकी विभाग के तकनीकी अधिकारी एके दुबे ने बताया कि पिछले कुछ सालों से मिर्च की खेती की ओर किसानों का रुझान बढ़ा है। विभागीय योजनाओं के जरिए किसानों को सिंचाई सुविधा के लिए अनुदान और बीज आदि दिया जा रहा है।

    सिर्फ 3 बीघा खेत का मालिक ये किसान पिछले 6 साल से कर रहा है हर महीने 1 लाख रूपए की कमाई

    सच्‍ची लगन और मेहनत से किया गया काम कभी व्‍यर्थ नहीं जाता। इस बात को सच कर दिखाया है सिरोही के एक छोटे से किसान ने। घाटे का सौदा समझे जाने वाले खेती के व्‍यवसाय से अपनी इसी मेहनत के बल पर आज वह करीब एक लाख रुपए प्रतिमाह कमा रहे हैं।

    धांता गांव निवासी किसान बाबाराम मेघवाल महज तीन बीघा खेत में गुलाब की खेती करते हैं और रोजाना तीन से चार हजार रुपए की कमाई कर रहे हैं। बाबाराम ने 2008 में 5 हजार रुपए लगाकर गुलाब की खेती शुरू की थी। वे पिछले छह साल से गुलाब की खेती कर रहे हैं। इस तीन बीघा खेत से सीजन में प्रतिदिन 40-45 किलोग्राम गुलाब की पैदावार होती है।
    वर्तमान में गुलाब 70-75 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिक रहा है। इस हिसाब से उनकी प्रतिदिन की आय करीब 3,000 रुपए से अधिक है और हर महीने करीब करीब एक लाख रुपए है।
    हालांकि, इनदिनों गुलाब का सीजन नहीं होने से पैदावार थोड़ी कम हो गई है। बाबाराम गुलाब के साथ दो बीघा खेत में हजारी फूल भी पैदा करते हैं, जिसकी आय अलग है। गुलाब की खेती के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बाबाराम मेघवाल को 10,000 रुपए का चेक और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया था।
    बाबाराम ने बताया कि उनके यहां के गुलाब सिरोही, गोयली, जावाल, बरलूट, सिरोड़ी, अनादरा समेत आसपास के क्षेत्रों में बिकने जाते हैं। बारिश के दौरान पैदावार अधिक होती है। कड़ाके की ठंड और लू चलने पर पैदावार कम हो जाती है। आमदिनों में 10-12 किलोग्राम गुलाब उतरते हैं, जबकि सीजन में इसकी पैदावार 40-45 किलोग्राम तक पहुंच जाती है।