आलू उत्पादन में श्री चौधरी ने बटोरी सुर्खियां...

पार्थी चौधरी, गुजरात के मेहसाना जिले में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के एक पुलिस अधिकारी। पिछले दिनों श्री चौधरी ने आलू उत्पादन में रिकार्ड तोड़ कर खुब सुर्खियां बटोरीं। तीन साल पहले उन्होंने बनासकांठा के जिला मुख्यालय पालनपुर स्थित अपने फार्म हाउस में प्रति एकड़ 87.188 टन आलू का उत्पादन लेकर ये रिकार्ड बनाया था। श्री चौधरी के मुताबिक जिलाधिकारी की भेजी गई एक टीम जिसमें पास ही स्थित दांतिवाड़ा विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ भी शामिल थे, इस रिकार्ड तोड़ उत्पादन के गवाह बने। पुरे इलाके में पुलिस अधिकारी के रिकार्ड तोड़ आलू उत्पादन की इस घटना की खासी चर्चा है। हालांकि गुगल सर्च में आलू के रिकार्ड तोड़ उत्पादन के एक और दावेदार दिखते हैं जो बिहार के हैं और जिनके बारे में कहा जात है कि उसी साल की शुरूआत में उन्होंने प्रति एकड़ 108.8 टन आलू उपजाए थे। आलू उत्पादन को लेकर भारत में गुजरात और पंजाब में औसत उत्पादन प्रति हेक्टेयर 26 टन का है।
श्री चौधरी 90 एकड़ में फैले अपने फार्म को प्रकृति का कारखाना मानते हैं। उनके लिए कृषि एक औद्योगिक कार्य है जिसमें विभिन्न पहलुओं को देखते हुए विभिन्न प्रक्रमों में बांटा जा सकता है जिससे न केवल अधिकतम वृद्धि सुनिश्चित की जा सके बल्कि जो मिट्टी और बीज से सर्वोत्तम न निकाल पाते हों ऐसे लोगों को हतोत्साहित करके इस प्रक्रम बाहर भी किया जा सके। अपने इस प्रक्रम में उनके मुलाज़िम उनके भागीदार भी हैं : भागीदारी की भावना के तहत उनके मुलाजिम उत्पाद का हिस्सा भी प्राप्त करते हैं। अपने प्रबंधन शैली से अपने भागीदारकों का दिल जीतने के लिए श्री चौधरी ने 100 प्वाइंट का फार्मुला भी तैयार किया है। 70 से उपर स्कोर करने वालों को बोनस और 50 से कम स्कोर करने वालों को जुर्माना भी भुगतना पड़ता है। हालांकि अब तक उनके यहां इस फार्मुले पर सिर्फ विजेता ही मिले हैं।
अहमदाबाद के राजपथ क्लब में कुछ लोग लेडी रोसैट्टा की चर्चा कर रहे हैं। लेडी रोसैट्टा आलू की उन्नत किस्म है जिसमें शूगर की मात्रा कम है और गुदा ज्यादा। अपने चमकदार चेहरे की वजह से इसे लेडी रोसैट्टा कहते हैं। श्री चौधरी ने राजकोट के चंदुभाई विरानी के बालाजी वेफर्स के लिए अपने आलू उपजाए हैं। पेप्सिको भी अपने कुछ उत्पादों के लिए आलू श्री चौधरी से लेती है। इस वर्ष प्रति एकड़ 67 टन का उत्पादन हुआ है। चौधरी जी बताते हैं कि उनके पास कोल्ड स्टोरेज में फिलहाल 1400 टन माल है। चौदह रुपये प्रति किलो के वर्तमान मूल्य के हिसाब से उनके पास फिलहाल 1.96 करोड़ रुपये का माल है। दुसरे शब्दों में, 120 दिन में 52 लाख रुपये की लागत पर तकरीबन 300 प्रतिशत का मुनाफा।

बनासकांठा को अंग्रेजी राज के जमाने से आलू की खेती के लिए जाना जाता है लेकिन मैक्डोनॉल्ड्स को दुनिया भर में आलू की सप्लाई करने वाली और खुद भी अपने ब्रांड नाम से वेग्स, फ्राइस और टिक्की बेचने वाली कनाडा की मैक्केन फूड्स ने यहां किसानों को वैज्ञानिक तरीके से आलू की खेती करना सिखाया।  मैक्केन मैक्डॉनाल्डस के आने के बाद 1998 में भारत आई। उन्होंने पंजाब, हरियाणा औऱ उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आलू पर काम किया लेकिन ठंडे मौसम में आलू भारी होता था और उसमें शूगर की मात्रा ज्यादा होती थी जिससे कि उसके लोकप्रिय उत्पाद फ्राइस का रंग बदरंग हो जाता। गुजरात की तरह पश्चिम बंगाल में आदर्श जलवायु उपलब्ध था लेकिन कांट्रेक्ट फार्मिंग को देखते हुए वहां जोत का आकार बहुत ही छोटा था। लिहाज़ा तीन साल पहले कंपनी ने इस तरह के ट्रायल को छोड ही दिया।
मैक्केन ने गुजरात में कृषि के संदर्भ में बेहद बर्बादी का नजारा पाया। बाढ़ के पानी से सिंचाई की परंपरा थी। लेकिन आलू को नमी चाहिए होता है न कि इतना ज्यादा पानी की पुरी फसल ही पानी में डूबी रही। बस इतना ही पानी आलू को चाहिए जितने में कि मिट्टी और पत्तियों से वाष्प बन कर उड़ जाए। नाइट्रोजनी उर्वरकों का बेहतरहा इस्तेमाल होता था। उच्च आद्रता की वजह से कीटों और फफुंद का भी आक्रमण फसल को झेलना होता था।

मैक्केन ने स्थानीय किसानों को फव्वारे से सिंचाई करने और जल एवं नाइट्रोजन का इस्तेमाल एक तिहाई तक कम करने के लिए राजी किया। अब ये राज्य में तकरीबन हर जगह दिखते हैं। राज्य सरकार की सब्सिडी और आठ घंटे की बिजली इनको उपलब्ध कराई गई है। सिंचाई के लिए फव्वारे कितने देर तक चलने हैं ये आंकड़ों के आधार पर कंपनी के दो मौसम स्टेशन तय करते हैं जिसमें से पहला राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है और दूसरा साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर में स्थित है। फोन और मोबाइल मैसेज के जरिए फिल्ड स्टाफ किसानों तक सूचनाएं पहुंचाते हैं। अन्य अन्वेषणों की मदद से कोल्ड स्टोरोज में ऊर्जा के उपयोग और बुआई के समय में भी कटौती की है।
मैक्केन ने साल 2006 में बडगाम गांव के चार किसानों की सोलह एकड़ की जोत से कांट्रेक्ट फार्मिंग की शुरूआत की थी। आज 4500 एकड़ में तकरीबन 900 किसान इसका हिस्सा हैं। इस इलाके के जोत काफी बड़े हैं। इनमें से तकरीबन आधे किसान दस एकड से भी ज्यादा की जमीन रखते हैं। कंपनी के क्रय अधिकारी गोपाल दास शर्मा बताते हैं कि हर किसान चाहे बडी जोत का मालिक हो या छोटी उन्हें हम खुद से जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं। मेहसाना स्थित कंपनी के संयंत्र की क्षमता 50 हजार टन प्रति साल की है जिसे वहीं संयंत्र के अंदर ही काट लिया जाता है।

नवंबर महीने में जब आलू के सीजन की शुरूआत होती है किसान कंपनी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं कि मार्च के तीसरे सप्ताह तक कंपनी को बीज की मात्रा से दस गुने फसल की आपूर्ति कर दी जाएगी जिसके बाद खरीद की प्रक्रिया रूक जाती है। फसल की गुणवत्ता का पैमाने स्पष्ट कर दिया गया है, आलू की सभी किस्मों के लिए गुजराती भाषा में खेती के अन्य प्रक्रमों के बारे में विस्तार से सारिणी उपलब्ध कराई जाती है, खेती से जुड़े अन्य सलाह फोन पर भी उपलब्ध कराया जाता है। किसानों को बीज आधी कीमत पर उपलब्ध कराई जाती है बांकि आधा फसल की बिक्री के वक्त काट लिया जाता है।

मैक्केन के साथ काम शुरू करने के कुछ सालों के बाद ही पार्थी चौधरी की तरह ही अन्य किसान भी बहुधा विभिन्न कंपनियों के लिए एक साथ ही आलू उपजाने का कार्य प्रारंभ कर देते हैं। मैक्केन की तरह ही पेप्सिको एवं बालाजी वैफर्स जैसी कंपनियां भी एजेंट के जरिए ही खरीद करती हैं जो सत्र की शुरूआत में ही आलू के खरीद का मूल्य घोषित करती हैं और उन्हीं के मुताबिक एजेंट को भी भुगतान करती हैं। समझौते के मुताबिक अगर आलू की खरीद नहीं हो पाती है तो यही एजेंट खुले बाजार से आलू की खरीद भी करते हैं कंपनियों के लिए।

कई तरह की परिस्थितियों – मंडी जाने की बजाए किसानों को सीधे बिक्री करने में सक्षम बनाने लायक कानून, खरीददार का विकल्प, नियमित बिजली आपूर्ति और सब्सिडी से जुड़ी कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता, बेहतरीन ग्रामीण सड़कों का जाल, इंटरनेट पर मौजुद सुचनाओं के अथाह सागर तक पहुंच और मोबाइल फोन जैसी सुविधाओं ने किसानों का जीवन बेहतर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गुजरात में आलू के इस खान में आकर कृषि से जुड़ी कई तरह की पारंपरिक मान्यताओं को आप टूटता देख सकते हैं। आमतौर पर विदेशी और भारतीय पूंजिपतियों के हाथों शोषित किसान, वैश्वीकरण से उपजा कृषि संकट, ग्रामीण इलाकों में आत्महत्या करते किसान, कुछ ऐसे ही तस्वीर देश भर में किसानों की दशा को लेकर पिछले कुछ सालों में बन रही थी जो गुजरात के इस इलाके में आकर एक दूसरे तरह की तस्वीर में बदल जाती है। मानजी भाई चौधरी जैसा छोटा किसान भी यहां पूरी तरह व्यवसायिक है। मानजी भाई गेंहू उपजाने की बजाए बाजार से खरीद कर लाते हैं लेकिन अपने खेतों में सिर्फ आलू ही उपजाते हैं। डेड़ एकड़ से शुरू हुआ उनका सफर आज तेरह एकड़ तक पहुंच चुका है।

उनके पड़ोसी मेघराजभाई चौधरी को आलू उपजाना मजेदार लगता है जिसका सबुत है कि अपने तीस से पैंतीस एकड़ खेत को उन्होंने इसी काम के लिए रखा है। उनकी समृद्धि का आलम ये है कि अपने फार्म हाउस के उपर उन्होंने तीस फीट उंचा गोदाम बना रखा है।कांतिभाई बेचरभाई पटेल जैसे किसान दो कंपनियों के लिए आलू उपजा कर अपनी आय को अधिकतम करना चाहते हैं। एक सुनिश्चित आय और दूसरी दाम बढ़ने की स्थिति में अत्यधिक मुनाफा कमाने की उम्मीद। रबर और प्लास्टिक तकनीक में एमएससी तक की पढ़ाई करने वाले पटेल मानते हैं कि कॉरपोरेट एजेंसीज अपने हित की वजह से सरकारी एजेंसीज की तुलना में बेहतर ढंग से कृषि तकनीक को बढ़ावा दे सकती हैं। उनकी ही तरह ये कंपनियां भी उत्पादन को बढ़ाने में पुरी दिलचस्पी से लगी हैं। उनकी सलाह से उनका उत्पादन तीन गुना बढ़कर अब 45 टन प्रति हेक्टेयर हो गया है। इस मुनाफे ने उन्हें निजीकरण का अटूट समर्थक बना दिया है।

कृषि को लाभ के सौदे में बदलते देखकर युवाओं का आकर्षण भी इसके प्रति बढ़ा है। भवेश सैनी ने निरमा इंस्टीच्युट ऑफ टेक्नॉलोजी से केमिकल इंजीनियरिंग की पढाई करने के बाद बंधी बंधाई आय वाली नौकरी करने के बजाए खेती करना बेहतर समझा। मूलत हरियाणा के सैनी को परिवार के साठ एकड़ की जोत में खेती करना अधिक रचनात्मक लगता है। उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने के उद्देश्य से उन्होंने अभी तक विवाह तक करना उचित नहीं समझा। हालांकि उनको कंपनी के बीज थोड़े मंहगे लगते हैं। सैनी को सरकार से मिलने वाले सब्सिडी की तब तक चिंता नहीं होती है जब तक सरकार इलाके जल स्तर को बरकरार रखती है।

दरअसल ये कृषि का एक ऐसा मॉडल बन कर उभरा है जो दुसरी जगहों पर भी दुसरी फसलों के संदर्भ में भी लागू किया जा सकता है। गुजरात राज्य सरकार ने भी इस पहल को बढ़ावा देने के लिए अपने स्तर पर कई रचनात्मक प्रयास किए हैं।

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